
DK. Basu,1986 में वेस्ट बंगाल के मानवाधिकार कार्यकर्ता थे | इन्होंने उस समय भारत के चीफ(Chief Justice) को एक चिट्ठी लिखी ,इस में उन्होंने देशभर में हो रही पुलिस हिरासत में मौत के बारे में न्यायपालिका का ध्यान आकर्षित कराया ,और साथ ही यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट गिरफ़्तारी और पुलिस हिरासत में मौत में बारे कोई दिशा-निर्देश जारी करे |
इस के बाद इस चिट्ठी को PIL में बदल दिया गया था और फिर इस मामले की सुनवाई शुरू की गई | इसी समय कोर्ट के सामने एक और मामला आया था ,Ashok K. Johari Vs Union Of India का इस में दिल्ली के तिहाड़ जेल में हो रही अमानवीय घटनाओ के बारे में प्रकार डाला गया था |
Supreme Court ने दोनो मामलो को एक साथ मिलाया और सुना और एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसको हम DK Basu Vs State of West Bengal के नाम से जानते है | सुप्रीम कोर्ट के पास एक बड़ा सवाल था क्या गिरफ़्तारी के समय आम आदमी के पास कोई अधिकार है और दूसरा अगर आम आदमी के किसी भी अधिकार का उल्लंघन होता है तो क्या उसके पास किसी प्रकार का क़ानूनी उपचार है |
1996 में इस केस में ऐतिहासिक निर्णय आया ,supreme Court के बेंच में जस्टिस थे Justice Kuldip Singh और Justice A.S. Anand इन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता(Freedom) और उसकी गरिमा(Dignity) को पुलिस हिरासत में सुरक्षित रखना ये राज्य की जिम्मेदारी है |
इस केस में Supreme Court ने 11 दिशा-निर्देश दिए थे तो बहुत अहम थे | जिसका पालन करना हर राज्य सरकार और पुलिसकर्मी की जिम्मेदारी है | ये दिशा-निर्देश नागरिक की सुरक्षा करने के लिए थे ताकि पुलिस के द्वारा पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति को यातना,अत्याचार और मौत का सामना ना करना पड़े और इस तरह की घटनाओं पर रोक लगायी जा सके |
DK Basu case के 11 दिशा-निर्देश

1-Policemen Must Wear Clear Identification Tags (पुलिस की पहचान)- गिरफ़्तारी के समय पुलिसकर्मी के पास उसका नेम्पलेट जो की उसके सीने में लगा होना चाहिए और उसका एक -एक अक्षर अच्छे से दिखना और पढ़ने लायक़ होना चाहिए | पुलिसकर्मी अपनी पुलिस की वर्दी में होना चाहिए और वो किस पद पर है वो भी साफ़-साफ़ लिखा होना चाहिए|
2-Arrest Memo Must be Prepared and Signed By Two Witnesses(गिरफ़्तारी मेमो)- गिरफ़्तारी का मेमो तैयार किया जाना चाहिए और कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर उसमे होने चाहिए |

3-Family or Friend Must be Informed of the Arrest( परिवार या मित्र को सूचना देना अनिवार्य)- गिरफ़्तारी के तुरंत बाद परिवार या फिर किसी मित्र को गिरफ़्तारी की सूचना देनी चाहिए |
4-Arrested Person Must be Informed of their Rights(गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस कस्टडी में उसके अधिकार बताना)- मान लीजीये पुलिस ने किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार किया ,तो ये पुलिसवाले की ड्यूटी है की वो उस व्यक्ति को बताये कि पुलिस हिरासत में उसके अधिकार क्या है ,जैसे उसकी गिरफ़्तारी किस जुर्म में हुई है ,उसके ख़िलाफ़ किसने FIR की है ,अपने वकील ,परिवार के लोग ,दोस्त को सूचना देने का अधिकार |
5-Entry Must Be Made In The Police Diary(पुलिस डायरी में एंट्री)- पुलिस थाने में पुलिस डायरी होती है जिसमे पुलिस ने दिनभर में क्या काम किए है उसकी जानकारी लिखनी होती है ,जैसे आज कौन सी शिकायत आयी ,पुलिस खोजबीन करने कहाँ गई ,कितने गवाह से बयान हुए,कितनी FIR हुई|

पुलिस ने कितने लोगो को गिरफ़्तार किया ,उसकी सूचना उनको कब मिली ,कितने बजे गिरफ़्तारी हुई,सब चीज़ की जानकारी पुलिस को पुलिस डायरी में लिखनी होती है ,अगर पुलिस ने किसी की गिरफ़्तारी की है तो उसको पुलिस डायरी में लिखना अनिवार्य है,गिरफ़्तारी के तुरंत बाद ये करना ज़रूरी है|
6-Medical Examination on time of Arrest(गिरफ़्तारी के समय मेडिकल जाँच)- जिस व्यक्ति को गिरफ़्तार किया गया है अगर उसको गिरफ़्तारी के समय किसी भी प्रकार की चोट लगी है या उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है ,तो गिरफ़्तार करने के तुरंत बाद उस व्यक्ति की मेडिकल जाँच कारानी ज़रूरी है | उसके बाद एक Inspection Memo तैयार किया जाएगा जिसमे पुलिस ऑफिसर और जो व्यक्ति गिरफ़्तार हुआ है ,दोनों लोग का हस्ताक्षर होगा ताकि ये सबूत रहे कि मेडिकल जाँच हुई थी |
7-Medical Examination Every 48 Hours During Custody(चिकित्सीय जाँच हर 48 घंटे में )- गिरफ़्तारी के बाद हर 48 घंटे ,में गिरफ़्तार व्यक्ति का मेडिकल जाँच होनी चाहिए | जिससे की अगर व्यक्ति को कोई गंभीर बीमारी है ,या फिर उसके स्वस्थ में किसी प्रकार की गिरावट हो ,उसका पता चल सके |
8-Magistrate Must Be Informed Of The Arrest(मजिस्ट्रेट को सूचना)- जब भी पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करती है ,तो गिरफ़्तारी की सूचना तुरंत उस जगह के मजिस्ट्रेट को भेजना ज़रूरी है | उसके साथ में गिरफ़्तारी के समय जो भी ज़रूरी दस्तावेज जैसे अरेस्ट मेमो ,व्यक्ति को किस समय ,किस जगह से गिरफ़्तार किया गया था उसके पास से क्या-क्या चीज़ बरामद हुई ,जैसी सारी जानकारी मजिस्ट्रेट को देना अनिवार्य है |
9-Informing a Relative or Friend living Outside the district or state(बाहर रहने वाले परिजन या दोस्त को खबर करना)- ऐसा नहीं है पुलिस जब किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करती है तो केवल जो शहर में उस व्यक्ति के परिजन या दोस्त को ही सूचित करेगी,अगर उस व्यक्ति का कोई भी परिचित शहर में नहीं है सब बाहर रहते है तो ये पुलिस की जिम्मेदारी बनती है कि वो उस व्यक्ति के परिजन को सूचित करे |
10-Meeting Lawyer(अपने वकील से मिलने का अधिकार)- गिरफ़्तार व्यक्ति अपने वकील से मिल सकता है ,ताकि जो भी क़ानूनी उपचार है वो उसको ले सके |
11-Police Control Room(पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना)- गिरफ़्तारी की सूचना तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को देनी होगी ,ताकि 12 घंटे के अंदर जो भी व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था उसकी सारी जानकारी जैसे व्यक्ति को किस पुलिसकर्मी ने गिरफ़्तार किया है ,वो इस समय कहाँ है इत्यादि जानकारी अपने कंट्रोल रूम में प्रदर्शित करना होगा |
अगर पुलिस DK Basu के दिशा-निर्देश का पालन ना करे तो क्या होगा |
अगर इस गाइडलाइन्स का पुलिसकर्मी पालन नहीं करता है तो कोर्ट ख़ुद पुलिसकर्मी के ख़िलाफ़ कार्यवाही करेगी और departmental action होगा ,क्योंकि अगर पुलिस DK Basu केस की गाइडलाइन्स का पालन नहीं करती है तो ये सीधा-सीधा हमारे संविधान के Article 21 और Article22(1) जिसमे आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का ज़िक्र है उसका उल्लंघन है |
FAQs
Q1. Supreme Court ने यह दिशा-निर्देश क्यों जारी किया था ?
Ans. पुलिस हिरासत में आम नागरिकों के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए |
Q2. क्या BNSS लागू होने के बाद भी DK Basu Guidelines का महत्व है ?
Ans. हाँ,इस का महत्व पहले क़ानून जैसा ही है | ये गिरफ़्तारी और हिरासत के दौरान आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है |
Q3. DK Basu Guidelines का उल्लंघन होने पर क्या करे ?
Ans. व्यक्ति उच्च अधिकारियों ,मानवाधिकार आयोग या सीधे high court या supreme कोर्ट में शिकायत कर सकता है |
Q4. क्या मेडिकल जाँच कराना ज़रूरी है ?
Ans. हाँ बहुत ज़रूरी है |
Q5.DK Basu Guidelines कब लागू हुई थी ?
Ans. ये guidelines 18 दिसंबर 1996 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लागू हुई थी |

सुमित कुमार एक अनुभवी क़ानूनी पेशेवर वकील है ,जिनका मुख्य उद्देश क़ानून की जटिलताओं को आसान भाषा में बताना है | क्रिमिनल और सिविल क़ानून के क्षेत्र में 5 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ,इस क्षेत्र में अपने काम के मध्यम से व्यापक रूप में योगदान दिया है |


