जमानत जिसको इंगलिश में Bail कहा जाता है ,उसकी परिभाषा BNSS, के चैप्टर 1,सेक्शन2(1)(b) में देखने को मिलती है | जब किसी व्यक्ति से कोई अपराध हो जाता है ,या फिर किसी रंजिश या साज़िश के चलते हुए उसे किसी झूठे केस में फाँसाया जाता है |
इस के चलते पुलिस उसको गिरफ़्तार करती है या करने वाली होती है ,तो ऐसे में क़ानून में उस व्यक्ति को जमानत पर जेल से बाहर आने का अधिकार दिया गया है | कई मामले ऐसे होते है जिसमे जमानत मिल सकती है ,और कई मामलो में जमानत नहीं मिल सकती है |

जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के कारण जेल जाता है ,तो ऐसे व्यक्ति को जेल से छुड़वाने के लिए Court या Police के द्वारा जो आदेश दिया जाता है ,उस आदेश को जमानत या Bail कहते है |
जब किसी व्यक्ति को जेल में रखा जाता है तो उस पर
- अन्वेषण (Investigation)
- जाँच (Enquiry)
- विचारण (Trial)
- अपील (Appeal)
की कार्यवाही विचाराधीन रहती है ,तो ऐसी पारिस्थिति में कोर्ट को ये तय करना मुश्किल होता है ,ये व्यक्ति इस केस में दोषमुक्त होगा या दोषसिद्ध होगा | अगर व्यक्ति उस केस में दोषमुक्त हो जाता है और लंबे समय के लिए उसको जेल में रहना पड़ता है ,तो ये उस व्यक्ति के प्रति अन्याय होगा |
इस से बचने के लिए उस व्यक्ति को bail दी जाती है | BNSS के अनुसार अपराध दो प्रकार के होते है –
- जमानतीय अपराध(Bailable Offence)
- ग़ैर या अजमानतीय अपराध( Non-Bailable Offence)
जमानतीय अपराध में व्यक्ति को जमानत देना पुलिस या कोर्ट का कर्तव्य है | जमानतीय अपराध में मारपीट,धमकी,लापरवाही से गाड़ी चलाना,लापरवाही से मौत,किसी व्यक्ति को साधारण चोट पहुँचाना ,उसको क़ैद करना,मानहानि करना जैसे मामले आते है |

इस तरह के मामलो में कुछ मामलो में थाने से ही जमानत देने का प्रावधान होता है आरोपी थाने में बेल बांड भरता है और फिर उसको जमानत दी जाती है | अगर किसी वजह से मामला कोर्ट में चला गया है तो कोर्ट को जमानत देनी पड़ेगी |
ग़ैर जमानती अपराधों में लूट,डकैती,हत्या,हत्या की कोशिश, रेप,अपहरण,फिरौती के लिए अपहरण,आदि अपराध शामिल है | ये सब मामले मजिस्ट्रेट के सामने जाते है |

अगर मजिस्ट्रेट को लगता है मामले में फाँसी या उम्रक़ैद की साज हो सकती है ,तो वो जमानत के लिये माना कर सकते है | अगर इस से कम सज़ा वाला कोई मामला है वो मामले की गंभीरता को देखते हुए व्यक्ति को जमानत दी जाती है |
सेशन कोर्ट किसी भी मामले में जमानत की अर्ज़ी स्वीकार कर सकता है | कोर्ट किसी भी मामले में जमानत दे सकता है ,लेकिन कोर्ट का निर्णय मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है |
जमानत(Bail) कितने प्रकार की होती है ?
भारत में आमतौर पर 3 प्रकार से ही जमानत दी जाती है |
1- नियमित जमानत ( Regular Bail)- जब कोई भी व्यक्ति गिरफ़्तार हो जाता है तब कोर्ट उसको जमानत देती है ,जब कोई भी व्यक्ति ग़ैर जमानती अपराध करता है तब पुलिस उसको अपनी हिरासत में ले लेती है ,जब हिरासत का समय ख़त्म होता है तो पुलिस उस व्यक्ति को जेल भेज देती है |

BNSS के सेक्शन 480,483 के अन्तर्गत ऐसे आरोपियों को हिरासत से रिहा करने का अधिकार है | इस लिये नियमित जमानत मुक़दमे में अपनी उपस्थिति सुनिचित करने के लिए हिरासत से आरोपी को रिहा करने का प्रावधान है |
2-अंतरिम जमानत (Interim Bail)- इस में थोड़े समय के लिए व्यक्ति को जमानत दी जाती है | नियमित जमानत या अग्रिम जमानत के लिये सुनवाई से पहले व्यक्ति को अंतरिम जमानत दी जा सकती है | यदि किसी मामले में अग्रिम जमानत के किए आवेदन किया गया है ,लेकिन पुलिस को मामले की जाँच करने की ज़रूरत है ,और कोर्ट को लगता है कि जाँच जल्दी पूरी नहीं की जा सकती है ,तो कोर्ट व्यक्ति को अंतरिम जमानत पर रिहा कर सकती है |

इस में व्यक्ति को क़ानूनी सुरक्षा दी जाती है ,और कोर्ट के अगले आदेश तक गिरफ़्तारी ना करने के लिए पुलिस को निर्देश दिया जाता है|
अंतरिम जमानत लेने के लिए व्यक्ति के पास कोई मज़बूत कारण होना चाहिए जैसे परिवार में किसी की मौत या परिवार में किसी की शादी इत्यादि |
3-अग्रिम जमानत ( Anticipatory Bail)- जब कोई व्यक्ति किसी अपराध में गिरफ़्तार होने वाला हो या उससे इस बात का डर हो कि उसे किसी ऐसे केस में फाँसा कर जेल भेजा जा सकता है ,जो उसने किया ही नहीं है ,तो ऐसे पारिस्थिति में जेल जाने से बचने के लिए ,व्यक्ति गिरफ़्तार होने से पहले ही BNSS के सेक्शन 482 के अन्तर्गत अग्रिम जमाना के लिए आवेदन कर सकता है |

अगर कोर्ट उसके आवेदन को स्वीकार कर लेती है,तो कोर्ट के आदेश के अनुसार पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ़्तार नहीं कर सकती
किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को जेल से छुड़ाने के लिए गारंटी के तौर पर कोर्ट के सामने जो संपत्ति जामा की जाती है ,या जामा करने की प्रतिज्ञा की जाती है ,उसे जमानत की राशि कहते है | व्यक्ति की जमानत होने के बाद कोर्ट को ये विश्वास हो जाता है ,की आरोपी व्यक्ति सुनवाई के लिए बुलाये जाने पर ज़रूर आएगा ,व्यक्ति के ना आने पर उसकी जमानत की संपत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी ,और पुलिस के द्वारा व्यक्ति को फिर से गिरफ़्तार किया जा सकता है |

अगर किसी व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया गया है तो उसकी भी कुछ सीमाएं है | व्यक्ति को देश छोड़ने से रोका जा सकता है ,और जब भी ज़रूरी हो तो व्यक्ति को कोर्ट या पुलिस के सामने उपस्थित होना पड़ता है |
जमानत पर जेल से बाहर जाने का मतलब है कि व्यक्ति आज़ाद तो है ,लेकिन वो कोर्ट की कई बंदिशों से घिरा होता है | ये बंदिशें bail bond से अलग होती है ,जैसे व्यक्ति रिहा होने के बाद शिकायतकर्ता को परेशान नहीं करेंगे ,किसी भी प्रकार से गवाह और सबूत को प्रभावित नहीं करेंगे |
एक तरह से और भी व्यक्ति को जमानत मिल सकती है ,जैसे किसी मामले में पुलिस ने समय से ChargeSheet दाखिल नहीं की है | जिन भी अपराद्यों में 10 साल से ज़्यादा की साजा है ,उसमे Charge Sheet दाखिल करने का पुलिस को 90 दिन का समय मिलता है ,व्यक्ति की गिरफ़्तारी होने के दिन से ,और जिन मामलो में व्यक्ति को 10 साल से कम की साज होती ,उसने पुलिस को 60 दिन का समय मिलता है |
अगर पुलिस कोर्ट में समय से Charge Sheet दाखिल नहीं करती है तो व्यक्ति को कोर्ट जमानत दे सकती है फिर चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों ना हो |

सुमित कुमार एक अनुभवी क़ानूनी पेशेवर वकील है ,जिनका मुख्य उद्देश क़ानून की जटिलताओं को आसान भाषा में बताना है | क्रिमिनल और सिविल क़ानून के क्षेत्र में 5 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ,इस क्षेत्र में अपने काम के मध्यम से व्यापक रूप में योगदान दिया है |


